लोकतंत्रशाला भारत के विभिन्न ग्रामीण और शहरी इलाक़ों से अनेक विषयों, रुचियों, पृष्ठ-भूमियों, वर्गों, लिंग, और जातियों वाले प्रशिक्षकों और अतिथि शिक्षकों को बुलाती रहती है। वे अपनी समझ को सीखने की इच्छा रखने वालों के साथ बाँटते हैं और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया चलती रहती है। इन प्रशिक्षकों के पास दूसरे शिक्षण सत्रों में भाग लेकर अन्य विषयों के बारे में सीखने का मौक़ा भी होता है। लोकतंत्रशाला में आने वाले शिक्षकों में कुछ थोड़े-बहुत साक्षर, कुछ बिल्कुल अनपढ़, तो कुछ अच्छे-ख़ासे डिग्रीधारी लोग भी होते हैं। इन शिक्षकों में मज़दूर, अनुभवी संगीतज्ञ, पारम्परिक इतिहासकार, किसान, महिलाएँ और सामाजिक कार्यकर्ता भी होते हैं जो अपना ज्ञान बाँटने हमारे यहाँ आते हैं।

स्थाई शिक्षकों के बजाय अतिथि शिक्षकों को बुलाने का तरीक़ा हमने इसलिए चुना ताकि बहुत से प्रतिबद्ध, संवेदनशील और हुनरमंद भारतीय जो अकादमिक, सामाजिक कार्य, मीडिया, कला, संस्कृति और अन्य क्षेत्रों में काम करते हैं और लम्बे समय तक हमारे साथ नहीं रह सकते वे भी सीखने की इस लोकतांत्रिक और सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें। लोकतंत्रशाला चाहती है कि इस तरीक़े के विचार-विमर्श और संवाद के लिए एक व्यवस्थित जगह और माहौल उपलब्ध करा सके।