संकल्पना और उत्पत्ति

स्कूल फॉर डेमोक्रेसी (एसएफडी) या लोकतन्त्रशाला वर्तमानमें भारत में लोकतांत्रिक शिक्षा और शिक्षा को बढ़ावा देनेके लिए समर्पित है। इसे एक ऐसे माध्यम के रूप में जाना जाता है जो विभिन्न सामाजिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि से सीखने के इच्छुक व्यस्क लोगों के उदार समूह को सक्रिय लोकतंत्र के सिद्धांत और व्यवहार के बारे में जानने और सीखनें के लिए सक्षम बनाता है। लोकतंत्र शाला भारत के संविधान में निहित मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध है, जो हमारी सभी गतिविधियों को क्रियाशील बनाता है। स्कूल का उद्देश्य है की लोकतांत्रिक शिक्षा के लिए प्रभावी तरीकों और तकनीकियों विकसित कर उसका उपयोग किया जाए है, जबकि समान और सहभागी लोकतंत्र के निर्माण में आने वाले की चुनौतियों को दूर करने में सहायक हो सके।

उद्देश्य

लोकतंत्रशाला भारतीय संविधान के ढाँचे में लोकतांत्रिक शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है। यह सीखने वालों की ज़रूरत के मुताबिक़ एक क्रियाशील लोकतंत्र के सामाजिक-राजनैतिक और सांस्कृतिक आयामों को साधने का प्रयास करती है। हमारे पाठ्य-क्रम में संवैधानिक और लोकतांत्रिक मुद्दों से जुड़े व्यापक और विविध विषय शामिल हैं। लोकतंत्रशाला उन सभी नागरिकों की ज़रूरतों के मुताबिक़ काम करती है जो प्रशासन, निर्णय-प्रक्रिया में जनता की भागीदारी और जवाबदेही तय करने सम्बंधी मुद्दों पर काम करते हैं।

परिसर

लोकतंत्रशाला परिसर राजस्थान के भीलवाड़ा ज़िले के बड़ी का बाड़िया नामक गाँव में स्थित है। ये दिल्ली और मुंबई को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 8 (NH 8) पर स्थित भीम क़स्बे से कुछ चार किमी. की दूरी पर है। परिसर तक़रीबन दो एकड़ वर्ग-क्षेत्र में फैला है और इसका निर्माण करने में ग़ैर-संस्थानिक भारतीय लोगों द्वारा दिए गए दान का उपयोग किया गया है। परिसर का निर्माण भी स्थानीय तकनीकों से किया गया और इसकी वास्तुगत रूपरेखा भी सामूहिक तरीक़े से तैयार की गयी है।

संसाधन

हमारे परिसर में एक मीटिंग हॉल, दो प्रशिक्षण हॉल, एक दफ़्तर, पुस्तकालय और एक ऑडियो-विज़ुअल और कम्प्यूटर रूम तथा भोजनशाला और शयनकक्ष हैं। यहाँ सभी सुविधाएँ बहुत सादी और बुनियादी हैं। हम बहुत ही साधारण भोजन और रहने की सुविधाएँ उपलब्ध करवाते हैं। पढ़ने-पढ़ाने के लिए हमारे यहाँ पर्याप्त जगह मौजूद है।

इमारत

पावणा: शिक्षक निवास

शिक्षक निवास में छः कमरे हैं जहाँ अधिकतम 16 लोगों के रहने की व्यवस्था की जा सकती है।

शौचालय और ग़ुसलखाना

इस भवन में दस शौचालय और दस ग़ुसलखाने हैं और साथ ही सौर-ऊर्जा से चलने वाले हीटर की व्यवस्था भी है।

प्रशिक्षणार्थी के लिए डॉरमेटरीज

प्रशिक्षण लेने वाले (महिला और पुरुष) के लिए अलग-अलग छात्रावास बनाए गए हैं। इनमें तक़रीबन सौ लोग रह सकते हैं।

रसोई

रसोई को बचे-खुचे सामान से बनाया गया है और इसके अंदर लिपाई भी की गयी है।

दफ़्तर

इस भवन में अकाउंट्स और प्रशासनिक दफ़्तर, कम्प्यूटर-रूम और पुस्तकालय है।

चिंतन: मीटिंग हॉल

यह लोकतंत्रशाला का मुख्य मीटिंग हॉल है। यह एक गोलाकार, गुम्बद वाला भवन है जिसकी संरचना ऐसी बनायी गयी है कि जब लोग बैठें तो एक-दूसरे के सामने बैठे हों इसके पीछे सोच ये है कि बोलते वक़्त सभी समान हों। यानी कि कोई मंच या ऐसा कुछ नहीं है जहाँ कुछ लोग विशिष्ट हों और बाक़ी सिर्फ़ सुनने वाले। इस हॉल में तक़रीबन 300 लोग बैठ सकते हैं।

रहना: स्टाफ़ के लिए आवास

‘रहना’ को तीन हिस्सों में बाँटा गया है। लोकतंत्रशाला स्टाफ़ के सभी लोग इस भवन में रहते हैं।

पधारो: अतिथि भवन

यह दो-मंज़िला छात्रावास जैसा भवन है जहाँ अलग स्नानागार और शौचालय हैं। पहली मंज़िल पर पुरुष और भूमितल पर महिलाओं के रहने की व्यवस्था की जाती है।

वर्षा-जल संग्रहण

बावड़ी

भूमिगत जल का स्तर बनाए रखने के लिए परिसर के निचले हिस्से में एक बावड़ी (वर्षाजल-संग्रहण का एक स्थानीय तरीक़ा) बनायी गयी है। सामाजिक कार्य एवं अनुसंधान केंद्र, तिलोनिया ने ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा-जल संग्रहण की अपनी मुहिम के तहत इस बावड़ी के निर्माण में आर्थिक सहयोग दिया है। इस बावड़ी की क्षमता लगभग दस लाख लीटर है।

वर्षा-जल संग्रहण टाँके

राजस्थान में पानी की कमी एक गम्भीर समस्या है। जिस इलाक़े में लोकतंत्रशाला स्थित है वहाँ भूमिगत जल खारा और अधिक वाला होने की वजह से पीने योग्य नहीं है। एक उपाय के तौर पर हमने बारिश के पानी के संग्रहण के लिए सामाजिक कार्य एवं अनुसंधान केंद्र, तिलोनिया के सहयोग से आठ टाँके बनाए हैं। इन सभी टाँकों की कुल क्षमता लगभग 4,75,000 लीटर है। बारिश के बहते हुए पानी को भूमिगत टाँकों में भेज दिया जाता है जो भंडारण के लिए बनाए गए हैं। बारिश के पानी को साफ़ करने के बाद उसका इस्तेमाल पेयजल के तौर पर, पौधों की सिंचाई के लिए और निर्माण कार्य आदि में किया जाता है।

सतीश देशपांडे

अध्यक्ष

सतीश देशपांडे दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। वे जाति-गत असमानता और आधुनिक भारतीय समाज में इसके रूपों पर लिखते और बोलते रहे हैं। 2007-08 के दौरान वे भारत सरकार के समान अवसर आयोग (EOC) के विशेषज्ञ समूह के भी सदस्य रहे हैं। वे कई राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय बुलेटिनों के सम्पादक भी रहे हैं और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की समाज शास्त्र की पाठ्य-पुस्तकों के लिए सलाहकार भी रहे हैं।

नौरती देवी

उपाध्यक्ष

नौरती देवी एक प्रतिबद्ध दलित और महिला-अधिकार कार्यकर्ता हैं। वे बाल विवाह, बलात्कार और सती आदि मुद्दों पर संघर्ष करती रही हैं। उन्होंने ही 1983 में न्यूनतम मज़दूरी के मुक़दमे में उच्चतम न्यायालय में जीत हासिल की थी। उन्होंने अजमेर ज़िले की हरमाडा ग्राम पंचायत में सरपंच के तौर पर भी काम किया है और 5000 से भी ज़्यादा महिलाओं की सदस्यता वाले राजस्थान महिला मोर्चा को बनाने में भी अहम भूमिका निभाई है।

लाल सिंह

सचिव

लाल सिंह एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मज़दूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल हैं। उन्होंने सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून आदि के संघर्षों में अहम भूमिका निभाई। उनकी सटीक राजनैतिक समझ और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पेचीदगियों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें एक आदर्श ‘राजनैतिक प्रशिक्षक’ बनाती है।


सदस्य

अरुणा रॉय

अरुणा रॉय एक सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। वे मज़दूर किसान शक्ति संगठन की संस्थापक सदस्य रही हैं और उन्होंने सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून आदि के अभियानों में भी अहम भूमिका निभाई। वे 2004-06 और 2010-2013 तक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) की सदस्य भी रहीं। वे कई अभियानों की अहम सदस्य रहीं हैं और वर्तमान में नैशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन (NFIW) की अध्यक्षा हैं। वर्ष 2000 में उन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार से नवाज़ा गया और 2010 में नानी पालकीवाला पुरस्कार और लोक प्रशासन में श्रेष्ठता के लिए लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाज़ा गया। वे वर्तमान में भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) के सलाहकार दल की सदस्य भी हैं।

त्रिपुरारी शर्मा

त्रिपुरारी शर्मा एक जानी-मानी नाटककार हैं। वे देश और विदेश में कई नाटक समूहों के साथ जुड़ी रही हैं। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली की कार्यकारी निदेशक भी रही हैं और वर्तमान में वहाँ अभिनय की प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने 2014-16 के दौरान लोकतंत्रशाला की गवर्निंग बॉडी की अध्यक्षता भी की है।

कमला भसीन

कमला भसीन महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करती हैं और लिंग-आधारित भेदभाव और पितृसत्ता के विभिन्न आयामों पर ख्यात प्रशिक्षिका हैं। वे 40 से ज़्यादा वर्षों से महिला आंदोलन से जुड़ी रही हैं। वे महिलाओं के क्षमता-वर्धन को समर्पित संस्था ‘जागो री’ की सह-संस्थापक भी हैं और साथ ही दक्षिण एशिया के नारीवादी नेट्वर्क ‘संगत’ की सलाहकार भी हैं।

सुशीला देवी

सुशीला सूचना के अधिकार और विकास पर कार्य करने वाली एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं। वे अजमेर ज़िले के ग्रामीण इलाक़ों में 25 से भी ज़्यादा सालों से कार्यरत हैं। सुशीला और उनके समूह की महिलाओं के 1996 में ब्यावर में लगे सूचना के अधिकार के धरने में दिए अहम योगदान से ही एक स्थानीय संघर्ष एक राष्ट्रीय अभियान में बदल पाया। सूचना के अधिकार को ‘हमारा पैसा, हमारा हिसाब’ जैसे नारे के साथ एक सटीक और स्पष्ट तरीक़े से परिभाषित करने का श्रेय सुशीला और जवाजा (राजस्थान) की उनकी साथी महिलाओं को जाता है। इन्होंने ही भारत को एक ऐसा नारा दिया जो कई भाषाओं में अनुवादित होकर पूरे भारत में इस्तेमाल किया जाता रहा है। इन्होंने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल स्वास्थ्य, महिलाओं तक उनके हक़ों की पहुँच, मज़दूरी, शिक्षा, पेयजल, राशन और विकास की राष्ट्रीय नीति आदि के लिए किया है।

अंकिता आनंद

अंकिता आनंद एक लेखिका और कवयित्री हैं और साथ ही ‘आतिश’ नामक नुक्कड़-नाटक समूह की सह-संस्थापक भी हैं। वे पूर्व में ‘सूचना के जन-अधिकार के राष्ट्रीय अभियान’ (NCPRI) के साथ भी काम कर चुकी हैं। उन्हें यूरोपीयन कमीशन का लोरेंज़ो नताली मीडिया पुरस्कार भी मिला है और वे वॉशिंगटन स्थित समूह ‘द रूल्ज़’ की फ़ेलो भी हैं जोकि वैश्विक असमानताओं को दूर करने के लिए काम करता है।

राधिका गणेश

राधिका लोकतंत्रशाला की सचिव रह चुकी हैं। अपने गृह-राज्य तमिलनाडु में काफ़ी काम करने के अलावा इन्होंने राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी काफ़ी वक़्त बिताया है जहाँ ये स्थानीय लोक-संस्कृति और लोगों को लामबंद करने और राजनैतिक काम के लिए सांस्कृतिक संप्रेषण के इस्तेमाल का अध्ययन भी करती रही हैं। इनकी सबसे नयी पहल ‘एक पोटली रेत की’ कार्यकर्ताओं का एक समूह है जोकि सबसे वंचित और हाशिए के वंशगत (hereditary) सांस्कृतिक समुदायों की अपने अधिकारों तक पहुँच के साथ-साथ उनकी पारम्परिक कलाओं, आजीविका और सांस्कृतिक प्रथाओं के दस्तावेजीकरण और इन्हें बचाए रखने की कोशिश विभिन्न राज्यों में कर रहा है।

बजरंग लाल शर्मा

बजरंग लाल शर्मा राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) में एक लम्बा वक़्त बिता चुके हैं। इन्होंने तीन दशकों से भी ज़्यादा समय तक सरकार के साथ काम किया। सरकारी सेवा में रहते हुए भी आपने स्वैच्छिक संगठनों से लगातार संवाद बनाए रखा। भूमि, ग्रामीण विकास, शिक्षा एवं पुनर्वास आदि विषयों में आप ख़ासी रुचि रखते हैं। आप वर्तमान में उदयपुर में रहते हैं।

रामकरण

रामकरण लिंग-आधारित विषयों पर प्रशिक्षण देते हैं और लोगों को लामबंद भी करते हैं। वे सामाजिक कार्य एवं अनुसंधान केंद्र (SWRC) तिलोनिया में कार्यरत हैं। इन्होंने समाज सेवा का अपना कार्य मात्र 15 वर्ष की उम्र में गाँव की महिलाओं को पढ़ाने के काम के साथ शुरू किया। ग्रामीण स्तर पर लिंग-आधारित मुद्दों और सामाजिक रीति-रिवाजों में लिंग-आधारित भेदभाव के घाल-मेल की गहरी समझ ने हमेशा इनके इन विषयों पर हस्तक्षेप को प्रभावी बनाया है।।

शंकर सिंह

शंकर सिंह एक सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, संप्रेषण के उस्ताद और मज़दूर किसान शक्ति संगठन के सह-संस्थापक हैं। एक संप्रेषक के तौर पर उनकी विलक्षण प्रतिभा ने सूचना के अधिकार, काम के अधिकार आदि के अभियानों को आम जनता तक पहुँचाने में बहुत मदद की है। वे कठपुतली-प्रदर्शन, गीत, नारों आदि से गूढ़ से गूढ़ राजनीतिक संदेश को बहुत ही सरल लेकिन ताक़तवर तरीक़े से लोगों तक पहुँचाने में महारत रखते हैं।

ललित माथुर

ललित माथुर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) से सेवानिवृत्त हैं। उन्होंने ग्रामीण विकास, अनुसूचित जातियों के विकास और लोक कार्यक्रम और ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद (CAPART) के सदस्य के तौर पर काम किया है। वे लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) से भी सम्बद्ध रहे हैं। वे राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (NIRD), हैदराबाद के महानिदेशक के पद पर भी रहे हैं।

गौतम भान

गौतम भारत के शहरों में ग़रीबी की राजनीति, असमानता और विकास पर काम करते हैं। उनका काम आवास, सामाजिक सुरक्षा, प्रशासन, और शहरी एवं योजना सिद्धांत आदि विषयों पर केंद्रित रहता है। वर्तमान में वे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन सेटल्मेंट्स (IIHS), बैंगलोर में अकादमिक एवं शोध विभाग के प्रमुख हैं। उन्हें इन विषयों पर सार्वजनिक संस्थानों को सलाह देने का भी काफ़ी तजुर्बा है। राजीव आवास योजना और नई दिल्ली म्यूनिसिपल क़ानून आदि के बनने में भी आप सलाहकार रहे हैं। वे शहरी सामाजिक आंदोलनों से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं और पत्र-पत्रिकाओं और ऑनलाइन माध्यमों में स्तंभकार एवं लेखक रहे हैं।

विपुल मुद्गल

डॉ. विपुल मुद्गल ने पिछले तीन दशकों से भी ज़्यादा समय से भारत, यूनाइटेड किंगडम और दक्षिण पूर्व एशिया में एक पत्रकार और अकादमिक के तौर पर काम किया है। वे एशिया के विभिन्न मीडिया प्रतिष्ठानों में वरिष्ठ सम्पादकीय पदों पर रहे हैं। इन्होंने भारत और विदेशों में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और इंटरनेट मीडिया के काम को सम्भाला है। एक सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया जानकार के तौर पर वे मीडिया, लोकतंत्र और राजनैतिक हिंसा आदि विषयों पर लिखते और काम करते रहे हैं।

नचिकेत

नचिकेत उडुपा कृषि के क्षेत्र में काम करते हैं और मज़दूर किसान शक्ति संगठन और सम्बद्ध अभियानों से 2010 से जुड़े रहे हैं। उन्होंने इससे पहले शिक्षा के क्षेत्र में भी काम किया है।

lalsingh

लाल सिंह

लाल सिंह जी लोकतंत्रशाला के सचिव की ज़िम्मेदारी सम्भालते हैं। वे मज़दूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक सदस्य भी हैं। उनका कबीर के दोहों और जे. कृष्णामूर्ति के जीवन सम्बंधी विचारों के प्रति प्यार और ग्रामीण भारत के लोगों और यहाँ की राजनीति की सटीक समझ उन्हें लोकतंत्रशाला जैसी एक जगह के लिए माक़ूल बनाती है।

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रेनी जोसेफ़

रेनी लोकतंत्रशाला के अकादमिक संयोजक हैं। मूलतः केरल के मँगाड़ गाँव के रेनी चेन्नई के लोयोला कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ चुके हैं। 2015 में लोकतंत्रशाला से जुड़ने से पहले वे ओडिशा में ‘ग्रामविकास’ संस्था और राजस्थान में मज़दूर किसान शक्ति संगठन के साथ काम कर चुके हैं। हमारी टीम को अनुशासित और व्यवस्थित बनाने में रेनी का अहम योगदान रहा है।

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जीतेन्द्र डबरिया

लोकतंत्रशाला का लेखा-जोखा (अकाउंट्स) सम्भालने का काम जीतेन्द्र करते हैं। वे खुले विश्वविध्यालय से स्नातक (कला) की पढ़ाई भी कर रहे हैं। वे राजस्थान के अजमेर ज़िले के छोटे से गाँव मुंडोती से ताल्लुक़ रखते हैं। अपनी स्कूली शिक्षा ख़त्म करने के बाद 2015 में इन्होंने लोकतंत्रशाला के साथ काम करना शुरू किया।

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तारू सिंह

लोकतंत्रशाला के परिसर या उसके बाहर हमारे द्वारा आयोजित गतिविधियों के वीडियो डॉक्युमेंटेशन का काम तारू करते हैं। वे परिसर के पास ही स्थित सोहनगढ़ गाँव से हैं और इस इलाक़े के गाँवों और लोगों की उनकी गहरी समझ हमें लोगों से जुड़कर हमारे काम की योजना बनाने और कार्यक्रम आयोजित करने में बहुत मददगार होती है। वे 2013 से हमारे साथ काम कर रहे हैं।

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भँवर सिंह

परिसर की देखभाल का ज़िम्मा भँवर जी के पास है और साथ ही वे रसोई में भी मदद करते हैं। वे किसान भी हैं, मिठाइयाँ बनाने के उस्ताद भी और हमारी टीम के शांत और मेहनती सदस्य हैं। उन्होंने ज़िंदगी भर देश के कई हिस्सों में कई तरह के काम किए हैं और लोकतंत्रशाला परिसर के निर्माण में भी हाथ बँटाया है। वे 2012 से हमारे साथ काम कर रहे हैं।

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लखन सिंह

लोकतंत्रशाला की रसोई का ज़िम्मा लखन सम्भालते हैं। वे इससे पहले सामाजिक कार्य एवं अनुसंधान केंद्र (SWRC), तिलोनिया के साथ भी काम कर चुके हैं और 2014 से हमारे साथ काम कर रहे हैं। लखन जहाँ मौजूद हों वहाँ हँसी और ठहाकों की आवाज़ें ना सुनाईं दें, ऐसा कम ही होता है!

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भैरु

भैरु हमारे स्टोर का ज़िम्मा सम्भालते हैं और दफ़्तर में भी मदद करते हैं। उम्र में हम सबसे छोटे भैरु परिसर के पास ही के थाणा गाँव से हैं। वे 2016 से हमारे साथ काम कर रहे हैं।

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अविनाश कुमार

अविनाश दिल्ली में लोकतंत्रशाला के काम की ज़िम्मेदारी सम्भालते हैं। वे दिल्ली में चर्चाओं और महाविद्यालयों में लोकतंत्र संवाद (डेमोक्रेसी डायलॉग्स) आदि कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। वे मूलतः बिहार से हैं और 2014 से लोकतंत्रशाला के साथ काम कर रहे हैं।

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लक्ष्मण

लक्ष्मण डॉक्युमेंटेशन/दस्तावेजीकरण का ज़िम्मा सम्भालते हैं। उनकी कलात्मक संवेदनाएँ और रूचि अक़्सर हमारे पोस्टर, प्रदर्शनियाँ आदि बनाने में बहुत काम आती हैं।

Kishan

किशन

किशन एक ग्रामीण वास्तुकार (आर्किटेक्ट) हैं जिन्होंने अन्य लोगों के साथ मिलकर परिसर की रूपरेखा भी बनाई और पूरी निर्माण प्रक्रिया का ज़िम्मा भी सम्भाला। वे परिसर की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी सम्भालते हैं और शुरू से ही हमारे साथ जुड़े रहे हैं।

Aditi

अदिति मनोहर

अदिति लोकतंत्रशाला के ‘सामुदायिक पुस्तकालय कार्यक्रम’ और ‘खमायती’ कार्यक्रम से जुड़ी हुई हैं। वे मैंगलोर से हैं और 2016 में अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बैंगलोर से ‘शिक्षा’ विषय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के बाद से ही हमारे साथ काम कर रही हैं।

कमल राज

अजमेर ज़िले के लोटियाना गाँव के रहने वाले कमल हमारी डॉक्यूमेंटेशन में सहायता करते हैं और वे हमारी संचार टीम का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कमल स्रातक (कला) कीपढाई ब्यावर के राजकीय महाविद्यालय से कर रहे हैं। वे जनवरी 2018 से हमारी टीम का हिस्सा हैं।

laxmi

लक्ष्मी

लक्ष्मी सधारन गाँव से हैं और परिसर की देखभाल और रसोई में मदद करने का काम करती हैं। वे 2015 से हमारे साथ काम कर रही हैं।

सिमरन व्यास

सिमरन हमारे सामुदायिक पुस्तकालय कार्यक्रम से जुड़ी हुई हैं और राजसमंद, भीलवाड़ा, अजमेर और अन्य इलाक़ों में विद्यालयों और महाविद्यालयों में कई कार्यक्रमों केआयोजन में सहायता करती हैं। वे ब्यावर के राजकीय महाविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्रातक (कला) की पढाई कर रही हैं। सिमरन थाणा गाँव की रहने वाली हैं औरसितम्बर 2017 से हमारी टीम का हिस्सा हैं।

संतोष

संतोष हमारी टीम की सबसे नई सदस्य हैं और वो लेखा–जोखा (अकाउंट्स) सम्भालना सीख रहीं हैं |वह देवडूंगरी गाँव से हैं और अपनी स्रातक (कला) की पढाई भीम सेकर रहीं हैं।