कोर्स

एक कोर्स (शिक्षण) किसी विषय पर एक सैद्धांतिक समझ बनाने और उसका विश्लेषण करने के लिए होता है। लोकतंत्रशाला लोकतांत्रिक महत्व के मुद्दों पर कई शिक्षण/प्रशिक्षण आयोजित करती रहती है। सीखने वालों की ज़रूरतों और विषय के अनुसार इन कोर्सेज़ की अवधि कुछ दिन से लेकर अधिकतम एक महीना भी हो सकती है। ये कोर्स अक़्सर सीखने वालों की ज़रूरतों के मुताबिक़ तैयार किए जाते हैं और इनमें कुछ अभ्यास-सत्र और फ़ील्ड विज़िट्स भी शामिल होती हैं। सीखने वाले अक़्सर ग्रामीण और शहरी भारत के कई वर्गों, तबक़ों, समुदायों और इलाक़ों से ताल्लुक़ रखने वाले होते हैं।

लोकतंत्रशाला द्वारा आयोजित किए जाने वाले विशेष कोर्सेज़ निम्नानुसार हैं:
• भारतीय संविधान
• लोक नीति (पब्लिक पॉलिसी)
• सामाजिक कार्य
• जाति और भेदभाव
• क़ानून और ग़रीबी

संविधान को समझना

Past Activities

पिछले दो दशकों में भारत में जो ‘अधिकार-आधारित’ विमर्श उभरा है और जिससे सूचना और काम के अधिकार, वन-अधिकार जैसे सार्थक क़ानून निकलकर आए हैं उसकी सैद्धांतिक बुनियाद भारतीय संविधान में निहित है। लेकिन अधिकतर भारतीय नागरिकों को भारतीय गणतंत्र के इस बुनियादी दस्तावेज़ हिंदुस्तानी आईन यानी भारतीय संविधान की बहुत कम समझ है। और इसीलिए संविधान को समझना लोकतंत्रशाला के लिए एक बड़ी अहम सीख है।
लोकतंत्रशाला ने संविधान पर बहुत सारे प्रशिक्षण और कार्यशालाएँ आयोजित की हैं। इनमें भाग लेने वाले लोग ग्रामीण राजस्थान के अलग-अलग इलाक़ों और पृष्ठ-भूमियों वाले होते हैं क्यूँकि हम ज़मीन पर लोकतांत्रिक समझ को बढ़ाने को प्रतिबद्ध हैं।

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ये कार्यशालाएँ आम तौर पर 15 से 20 लोगों के छोटे समूहों में होती हैं और इनकी शुरुआत संविधान की प्रस्तावना को समझने के साथ होती है। इन कार्यशालाओं में मूल अधिकार, नीति-निर्देशक तत्व, सरकार की संरचना, पंचायती राज और संवैधानिक संस्थाओं आदि के बारे में बात की जाती है। साथ ही संवैधानिक ज्ञान के अलावा क़ानून, राजनैतिक दल और विचारधारा आदि पर भी समझ बनाने का प्रयास किया जाता है।

बात-चीत में सामयिक महत्व के मुद्दे भी शामिल होते हैं। मसलन, क़ानूनी विषयों जैसे सुनवाई का अधिकार या व्हिसल-बलोआर विधेयक पर भी बात होती है। कार्यशाला में भाग लेने वाले लोगों की रुचि के मुताबिक़ ही कार्यशाला के विषय तय करने से प्रतिभागी ज़्यादा ख़ुशी से भाग लेते हैं। जैसे पंचायती राज पर अक़्सर बहुत बहस होती है क्यूँकि यह गाँव में हर किसी पर सीधा प्रभाव होता है। पुलिस थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराना, क़ानून की व्यावहारिक समझ, भूमि सम्बंधी मुद्दों पर भी बहुत बात-चीत होती है। ये कार्यशालाएँ इस विचार के साथ नहीं आयोजित की जातीं कि कुछ ‘शिक्षक’ होंगे और कुछ ‘विद्यार्थी’ बल्कि इनका उद्देश्य एक सामूहिक और सहभागी विचार-विमर्श का होता है जहाँ ‘शिक्षक’ भी उतना ही सीख कर जाते हैं जितना कि ‘विद्यार्थी’।

सामाजिक कार्य

Past Activities

युवा और सामाजिक कार्य करने की आकांक्षा रखने वाले लोगों को सामाजिक कार्य में दीक्षित करने के मक़सद से यह कोर्स विकसित किया गया है। इसे इस तरीक़े से बनाया गया है कि कार्यकर्ताओं के पास जो समझ और तजुर्बा पहले से है उसी पर काम कर उसे निखारा जाए और उन्हें लोकतांत्रिक सिद्धांतों की बहुमुखी समझ दी जाए। इस प्रशिक्षण में सामाजिक आंदोलनों का इतिहास, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका की संरचना, राजनीति और विचारधारा और अन्य कई विषय शामिल हैं। साथ ही कार्यकर्ताओं को कठपुतलियाँ बनाना, ढोलक बजाना, सरकारी अधिकारियों को चिट्ठियाँ लिखना और अन्य व्यावहारिक दक्षता हासिल करना भी शामिल है। मज़दूर किसान शक्ति संगठन और लोकतंत्रशाला के लोगों के अलावा बाहर से भी अलग-अलग विषयों के जानकारों को इन प्रशिक्षणों में बुलाया जाता है जो सामाजिक अंकेक्षण, विकास, क़ानून आदि विषयों पर सत्रों का संचालन करते हैं।

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लोकतंत्रशाला ने सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक महीने का पहला प्रशिक्षण नवम्बर 2013 में आयोजित किया। राजस्थान के विभिन्न ग़ैर-सरकारी संगठनों से लगभग दस कार्यकर्ता और सामाजिक कार्य में जाने की इच्छा रखने वाले लगभग दस अन्य युवा इस प्रशिक्षण में शामिल हुए। यह प्रशिक्षण 11 नवम्बर, 2013 को शुरू हुआ।

लोक-नीति (पब्लिक पॉलिसी)

Past Activities

मज़दूर किसान शक्ति संगठन और लोकतंत्रशाला ने मिलकर लोक-नीति पर महीने-भर के एक प्रशिक्षण का आयोजन किया। इस प्रशिक्षण में बैंगलोर के राष्ट्रीय विधि संस्थान (NLSIU, Bangalore) के ‘मास्टर्ज़ इन पब्लिक पॉलिसी’ कोर्स के 43 विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।

इस प्रशिक्षण का उद्देश्य यह था कि विद्यार्थी जोकि अक़्सर विचारधाराओं या धारणाओं के जाल में फँसे होते हैं उन्हें उस जाल से बाहर निकालकर ‘वास्तविक’ मुद्दों से उनका परिचय कराया जाए और लोक-नीति के बारे में जो एक सामान्य और एक विशेष समझ बन गयी है उसे तोड़ा जाए। इस प्रशिक्षण के ज़रिए उनके अनुभवों को एक संदर्भ में डालते हुए उनका परिचय उस स्थापित लोक-नीति के ढाँचे से कराया जाए जिसमें कि एक वंचित वर्ग का कोई मज़दूर या छोटा-मोटा किसान अपने हक़ों को पाने की कोशिश करता है। इसका मक़सद यह था कि ये स्थापित किया जाए कि सार्थक नीतियों और उनके सार्थक कार्यान्वयन के लिए उसमें जनता की भागीदारी ज़रूरी है क्यूँकि इससे ना सिर्फ़ नीतियाँ बेहतर बन सकती हैं बल्कि कार्यान्वयन भी बेहतर हो सकता है क्यूँकि किसी भी क़ानून या नीति का असल मूल्याँकन और निगरानी वह जनता ही कर सकती है जिसके लिए उसे बनाया गया है।

इस प्रशिक्षण में अकादमिक (सैद्धांतिक) और व्यावहारिक दोनों ही पक्षों का एक संतुलन बनाते हुए व्यापक सामाजिक परिदृश्य और मुद्दों की एक समझ बनाने की कोशिश की जाती है। इस प्रशिक्षण में सैद्धांतिक सत्र, फ़ील्ड भ्रमण, विभिन्न विषयों पर व्यक्तिगत और सामूहिक चिंतन के लिए सत्र आदि होते हैं।

क़ानून और ग़रीबी

Past Activities

हम सामान्यतः जिसे ‘ग़रीबी’ कहते हैं उसके संदर्भ में क़ानून और न्याय की प्रकृति को समझने और उसकी पड़ताल करने की सोच के साथ यह कोर्स बनाया गया है। इसके ज़रिए ये जानने की कोशिश की जाती है कि क्या क़ानून बराबरी लाता है? या फिर, पहले से मौजूद असमानता को और बढ़ाता है या फिर अलग-अलग वक़्त पर ये दोनों काम करता है। क़ानूनों की ये जाँच-पड़ताल कई तरह के क़ानूनों के इर्द-गिर्द हो सकती है, जैसे – भिक्षा-वृत्ति रोकने सम्बंधी क़ानून, मैला ढोना, भूमि अधिग्रहण, औद्योगिक आपदाएँ और मुआवज़ा, पाँचवीं अनुसूची (या जनजाति इलाक़ों) के क़ानून, डी-नोटिफ़ायड जनजातियों या प्रशिक्शनारथीयों के अपने अनुभवों से नाइकी किसी विषय पर भी हो सकती है।

इस प्रशिक्षण के ज़रिए यह भी कोशिश की गयी कि निम्नलिखित सवाल चर्चाओं में शामिल हों:

  • • एक क़ानून पर ‘मालिकाना हक़’ के क्या मायने हैं? (जैसे – PESA क़ानून, खाध्य सुरक्षा क़ानून, नरेगा, आदि)
  • • क्या वाक़ई ग़रीबों के लिए ‘निजता’ का कोई मतलब नहीं है? ‘निजता’ का उनके लिए क्या मतलब हो सकता है?
  • • आदर्श, व्यावहारिक या पूर्वाग्रह/पक्षपात जैसे विचारों की वजह से क़ानून पर क्या फ़र्क़ पड़ता है?
  • • ग़रीबों की ज़िंदगी पर सत्ता, नियंत्रण, और आदि का क्या फ़र्क़ पड़ता है?
  • • कैसे ग़ैर-क़ानूनी, और अतिक्रमण जैसे विचारों से उन लोगों की न्याय की कैसी समझ बनती है जो कि ग़रीब हैं?

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