लोकतंत्र संवाद

व्याख्यान माला (सार्वजनिक व्याख्यान शृंखला)

लोकतंत्रशाला कई ऐसी शख़्सियतों की याद में व्याख्यानों का आयोजन करती रहती है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी हमारे लोकतंत्र को मज़बूत करने में अपना योगदान दिया। इन व्याख्यानों में गाँवों और शहरों से अच्छी-ख़ासी तादाद में लोग भाग लेते हैं और इस शृंखला का मक़सद कुछ ऐसे लोगों को जगह देने का होता है जिन्हें अक़्सर ‘पढ़े-लिखे और संभ्रांत’ लोग नहीं सुन पाते जैसे कि नौरती देवी जोकि तिलोनिया गाँव की एक अशिक्षित महिला हैं और अपनी कड़ी मेहनत से वे तिलोनिया ग्राम पंचायत की सरपंच भी बनीं। उनके व्याख्यान ने एक दलित महिला के सरपंच बनने के दृष्टिकोण को उभारा। सुशीला, एक सूचना-अधिकार कार्यकर्ता, जिन्होंने ‘हमारा पैसा, हमारा हिसाब’ नारा दिया उन्होंने सूचना के अधिकार पर ग्रामीण राजस्थान में पनपे संघर्ष को बहुत ही संक्षेप में परिभाषित किया।

अतीत संवाद

मोहन बा स्मृति व्याख्यान

मज़दूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक सदस्यों में से एक मोहन बा की 2013 में मृत्यु के पश्चात लोकतंत्रशाला ने उनकी याद में एक स्मृति व्याख्यान शृंखला शुरू की। मोहन बा एक बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे। गांधीवादी सोच वाले मोहन बा को उन सामाजिक रिश्तों की गहरी समझ थी जिनसे कि ग्रामीण शोषण उत्पन्न होता है। वे एक अच्छे गायक और लेखक भी थे जिन्होंने अभियान के लिए कई गीत भी लिखे। इस व्याख्यान शृंखला का सब-टेक्स्ट है — संसद का एक खम्भा मैंने भी उठाए रे! जो ये बताता है कि भारत का हर एक नागरिक संसद में भागीदारी रखता है।

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